पुराने समय की एक कहानी है। एक जंगल में कछुए और खरगोश रहते थे। दोनों दोस्त थे, लेकिन उनमें भाग दौड़ में भेदभाव था। खरगोश बहुत तेज़ था, जबकि कछुआ धीरज़ से अपने कदम रखता था। एक दिन, खरगोश ने कछुए को चुनौती दी कि उससे दौड़ में मुकाबला करें। कछुआ खरगोश की चुनौती स्वीकार कर बोला, "ठीक है, मैं भी साबित करता हूँ कि धैर्य से आगे बढ़ना भी महत्वपूर्ण है।"
दिन तय हो गया। दोनों कछुए और खरगोश एक सीढ़ी से शुरू होकर दौड़ने लगे। खरगोश आगे निकल गया और बड़ी जल्दी से अगली सीढ़ी तक पहुंच गया। वहां पहुंचकर उसे लगा कि कछुआ बहुत दूर पीछे है। उसने चिंता करना छोड़ दिया और सोचा कि वह आराम से बैठ जाएगा और जब कछुआ आएगा तो उसे फिर से पकड़ लेगा।
खरगोश आराम से बैठ गया और उबकरी खाने लगा। इसके बीच, उसकी आंखें भारी हो गईं और उसे नींद आ गई। वह आसानी से सो गया और सपने में ही अपनी विजय का सम्मान करने लगा।
जब कछुआ अगली सीढ़ी पर पहुंचा तो उसे देखकर चक्कर आ गए। उसे अपने दोस्त को ऐसे ही सोते हुए देखने का मौका नहीं मिलेगा। धीरज से वह आगे बढ़ता रहा और खरगोश की नींद उड़ गई।
कछुए ने धीरज से खरगोश को पार कर लिया और दौड़ में विजयी हो गया। खरगोश को जब नींद खुली, तो उसे अपनी लापरवाही का आभास हुआ। उसके दोस्त कछुए ने उसकी अहंकार को तोड़ दिया था। उस दिन से, खरगोश ने सीखा कि धैर्य और सतत प्रयास ही सफलता की कुंजी होती है।

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